जालंधर (ब्यूरो):- देश की पहली हाईस्पीड ट्रेन करीब 300 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से 508 किमी का सफर पूरा करेगी। अहमदाबाद से मुंबई का ये सफर तय होगा सिर्फ 2 घंटे 7 मिनट में। ट्रेन का ट्रैक इस तरह तैयार किया जा रहा है कि ब्रिज, टनल और समुद्र में भी इसकी रफ्तार धीमी नहीं होगी।
नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन (NHSRCL) के मुताबिक, पूरे प्रोजेक्ट में 23 रिवर ब्रिज बनाए जाएंगे। 19 ब्रिज गुजरात में बन रहे हैं, 4 ब्रिज महाराष्ट्र में बनेंगे। इनमें से 5 कॉन्क्रीट और 12 स्टील ब्रिज होंगे।
NHSRCL के एक अधिकारी ने बताया कि बाकी के 6 ब्रिज वायडक्ट के नीचे आएंगे। जैसे कि कोई नदी जिसकी चौड़ाई 40 मीटर से कम है तो वहां ब्रिज नहीं बना रहे हैं। उसे वायडक्ट के दो पिलर के बीच से गुजार रहे हैं। सबसे लंबा 1.26 किमी का ब्रिज भरूच जिले में नर्मदा नदी पर बन रहा है। यह जुलाई 2024 में पूरा होगा।
इस सीरीज के पहले पार्ट में आपने पढ़ा कि बुलेट ट्रेन के 12 स्टेशन और ट्रैक कितने तैयार हैं, इस पार्ट में पढ़िए ट्रैक, ब्रिज और टनल कैसे बन रहे हैं और कहां कितना काम बाकी है…
ब्रिज के पिलर की गहराई 38 से 50 मीटर
अहमदाबाद से मुंबई के रास्ते में 26 अप्रैल, 2023 को दोपहर करीब 12 बजे हम खोलवड़ गांव के पास ब्रिज कंस्ट्रक्शन साइट पर पहुंचे। आणंद और वडोदरा को जोड़ने वाली माही और तापी नदी पर करीब 720 मीटर लंबा पुल बन रहा है। तापी नदी के किनारे बसा खोलवड़ गांव सूरत से 20 किमी दूर है। करीब 45 मिनट के सफर में हमें 4 किमी का कच्चा रास्ता भी तय करना पड़ा। साइट पर कंस्ट्रक्शन का काम संभाल रहे थर्ड पार्टी ठेकेदार मिले।
उन्होंने पहले ही कह दिया कि मेरा नाम कहीं नहीं लीजिएगा। भरोसा होने पर उन्होंने डायग्राम के जरिए पूरा प्रोजेक्ट समझाया और फिर 720 मीटर चौड़ी नदी पर बन रहे ब्रिज की खूबियां गिनाने लगे। ठेकेदार के मुताबिक, यहां से मुंबई की दूरी करीब 276 किमी है। प्रोजेक्ट का दूसरा सबसे लंबा ब्रिज यहीं है। इसे 2024 तक तैयार कर लिया जाएगा।
अभी 13 वेल फाउंडेशन पिलर बन रहे हैं। इनकी गहराई जमीन की सतह से 38 से 50 मीटर नीचे तक होगी। यानी यह 16 फ्लोर की एक बिल्डिंग के बराबर गहराई तक होंगे।
कंस्ट्रक्शन साइट पर मौजूद एक अन्य अधिकारी ने बताया कि एक पिलर की मोटाई 10 मीटर है। कोशिश कर रहे हैं कि इस बरसात से पहले सभी पिलर्स को डेप्थ लेवल तक कम्प्लीट कर दें। अधिकारी हमें वेल फाउंडेशन तकनीक समझाने और दिखाने भी ले गए। इसके 10 पिलर्स पर काम जारी था।
पहले जमीन में वेल यानी कुआं बनाया जाता है। इस वेल का बाहरी हिस्सा सरिये और कॉन्क्रीट से बना होता है और बीच में से ये खाली होता है। ये बाहर से देखने में कुएं जैसा दिखता है। फिर वेल से पानी, मिट्टी और पत्थरों को तोड़कर निकाल दिया जाता है और उस खाली जगह में कॉन्क्रीट भर दी जाती है। ऐसे एक पिलर तैयार हो जाता है।
चट्टानें तोड़ने के लिए चीन से मशीनें मंगाईं
अधिकारी ने बताया कि यहां तीन शिफ्ट में 24 घंटे काम चल रहा है। गर्मी की वजह से मजदूरों को दोपहर 2 से 4 बजे के बीच ब्रेक दिया जाता है। वेल की खुदाई के दौरान चट्टानें तोड़ने में ज्यादा समय लग रहा है। शुरू में इसके लिए हमने चीन से मशीनें मंगवाईं थीं। अब ये मशीनें भारत में ही बन रही हैं।
ब्रिज बनाने से पहले इंजीनियर्स, मशीनों और इक्विपमेंट्स के मूवमेंट के लिए कंस्ट्रक्शन साइट के ठीक बगल में एक छोटा ब्रिज बनाया गया है। अधिकारी ने बताया कि नदी का फ्लो न रुके, इसलिए हमने ब्रिज के निचले हिस्से को ओपन रखा है। दिक्कत तब होगी, जब नदी में पानी बढ़ेगा।
वलसाड में पार नदी पर पहला पुल तैयार
मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर पर वलसाड जिले की पार नदी पर पहला रिवर ब्रिज तैयार है। ये ब्रिज वापी और बिलिमोरा स्टेशन के बीच है। पार नदी की कुल चौड़ाई 360 मीटर है। इसमें करीब 160 मीटर पर फुल स्पैन गर्डर्स की लॉन्चिंग का काम पूरा हो गया है।
ब्रिज पर हमें मजदूर चिलचिलाती धूप में तपते लोहे के सरियों को वेल फाउंडेशन के लिए बांधते नजर आए। ओडिशा से आए एक मजदूर ने बताया, ‘बरसात आने वाली है, इसलिए हम पर प्रेशर ज्यादा है। एक बार नदी में पानी बढ़ गया, तो हमारी मेहनत बर्बाद हो जाएगी। साइट पर ही खाने का इंतजाम किया गया है। दिन में तेज गर्मी होती है, इसलिए सुबह, शाम और रात में तेजी से काम होता है।’ इस साइट पर रात में काम करने के लिए 4 बड़े जनरेटर्स लगाए गए हैं।
जापान के राजदूत काम देखने आए, तारीफ करके गए
इसके बाद मुंबई की ओर बढ़ते हुए प्रोजेक्ट पर बन रहे सबसे बड़े ब्रिज पर पहुंचे। 1260 मीटर का यह ब्रिज भरूच जिले में नर्मदा नदी पर बन रहा है। NHSRCL के एक अधिकारी ने बताया कि इसका काम जुलाई 2024 में पूरा होगा। हालांकि नर्मदा नदी में पानी बढ़ जाने की स्थिति में दिक्कत आ सकती है।
अधिकारी ने बताया, ‘मानसून में नदी का जलस्तर बढ़ने पर काम न रुके इसलिए ब्रिज से 60 मीटर दूर दोनों ओर 8 मीटर के दो अस्थायी ब्रिज बनाए गए हैं। इससे पूरे साल 24 घंटे काम जारी रह सकता है। यह ब्रिज भी वेल कंस्ट्रक्शन तकनीक से बन रहा है।
भारत में जापानी राजदूत सातोशी सुजुकी इस ब्रिज का कंस्ट्रक्शन देखने आए थे। उन्होंने कहा था कि भारत में जिस गति और तकनीक से कंस्ट्रक्शन चल रहा है, वह जापान के लिए भी सीखने वाला है।’
वलसाड में पहाड़ में बन रही 350 मीटर लंबी सुरंग
महाराष्ट्र में एंट्री से पहले ट्रेन वापी स्टेशन से 18 किमी दूर वलसाड जिले के जरोली गांव में बन रही 350 मीटर लंबी सुरंग से गुजरेगी। 27 अप्रैल को शाम 6 बजे हम जरोली पहुंचे। अभी भी पहाड़ पर बन रही इस टनल में काम जारी था। इसके बगल में टेंट लगा था और सेलिब्रेशन की तैयारी चल रही थी। हमने पूछा तो पता चला कि 100 मीटर की सुरंग खोद ली गई है, इसी का जश्न मनाया जा रहा है।
एक अधिकारी ने बताया कि जरोली गुजरात और महाराष्ट्र का बॉर्डर भी है। इस टनल में इलेक्ट्रो-मैकेनिकल तकनीक का इस्तेमाल होगा। इससे बुलेट ट्रेन जब पूरी रफ्तार से गुजरेगी, तब भी न टनल और न ही ट्रेन को नुकसान होगा। इस टनल में भी न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड तकनीक इस्तेमाल की जा रही है। इसमें ब्लास्ट के जरिए पहाड़ को तोड़ा जाता है। इसके बाद कई लेयर में टनल तैयार की जाती है। सुरंग तैयार करने के लिए ये सबसे सटीक और सुरक्षित तरीका माना जाता है।
7 किमी लंबी ‘सी टनल’ से गुजरेगी बुलेट ट्रेन
जारोली के बाद हम बोईसर, विरार होते हुए ठाणे के शीलफाटा पहुंचे। यहीं से बुलेट ट्रेन अंडरग्राउंड होगी और 21 किमी का सफर पूरा कर मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स पहुंचेगी। इस सफर में ये 7 किमी की सी टनल से भी गुजरेगी। इस दौरान भी ट्रेन की रफ्तार 300 किमी/प्रति घंटे से कम नहीं होगी।
ठाणे क्रीक में आने वाली ये सुरंग समुद्र में बनी देश की सबसे लंबी टनल होगी। फिलहाल इसका काम शुरू नहीं हुआ है लेकिन टेंडर प्रोसेस पूरी कर ली गई है। शीलफाटा में हमने देखा कि यहां खाली जमीन पड़ी है, मार्किंग के लिए एक पिलर लगा है। आसपास के लोगों को फ़िलहाल इसका पता नहीं है कि यहां से बुलेट ट्रेन गुजरने वाली है।
13 मीटर गोलाई वाली कटिंग मशीन से बन रही टनल
7 किमी के सी रूट के बारे में एक अधिकारी ने बताया कि ये एक सिंगल ट्यूब टनल होगी, जिसमें अप और डाउन रूट के लिए दो अलग-अलग ट्रैक होंगे। टनल के पास ही 37 लोकेशन पर 39 इक्विपमेंट रूम बनाए जाएंगे। टनल बनाने में 13.1 मीटर के कटर हेड वाली टनल बोरिंग मशीनों का इस्तेमाल किया जाएगा। शहरी क्षेत्रों में या मेट्रो रूट की टनल के लिए 5-6 मीटर के छोटे कटर हेड का इस्तेमाल किया जाता है।
अधिकारी के मुताबिक, तीन टनल बोरिंग मशीनों का इस्तेमाल लगभग 16 किमी हिस्से को बनाने में किया जाएगा। शीलफाटा में टनल का 5 किमी हिस्सा न्यू ऑस्ट्रियाई टर्नलिंग मैथड (NATM) से तैयार होगा। यह टनल जमीन से करीब 25 से 65 मीटर गहराई में बनेगी। इसका सबसे गहरा कंस्ट्रक्शन पॉइंट शीलफाटा के पास पारसिक हिल से 114 मीटर नीचे होगा।
टनल बनाने के लिए BKC, विक्रोली और सावली में करीब 36, 56 और 39 मीटर की गहराई पर तीन शॉफ्ट बनाए जाएंगे। बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के तहत समुद्र के अंदर इतनी लंबी टनल बनाने का ये देश में पहला प्रोजेक्ट है। पुल और टनल बनाने के लिए स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) के भिलाई स्टील प्लांट यूनिट से लोहे की सप्लाई की गई है।
यमुना नदी में अंडर वाटर टनल बनाने की हुई थी कोशिश
इससे पहले दिल्ली-मुंबई रैपिड रेल ट्रांजिट प्रोजेक्ट के लिए यमुना नदी में अंडर वाटर टनल बनाने की कोशिश हुई थी। हालांकि, ये प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया। इसके अलावा ब्रह्मपुत्र नदी में भी एक सुरंग बनाने की योजना पर काम चल रहा है। इसका इस्तेमाल गाड़ियों और ट्रेनों दोनों के लिए होगा।
100 साल तक काम करेंगे ब्रिज, भूकंप का भी असर नहीं होगा
भूकंप के लिहाज से गुजरात हाईरिस्क जोन में रहा है। भरुच और सूरत में अक्सर भूकंप आते हैं। हाईस्पीड ट्रेन का ट्रैक दोनों जिलों से निकलता है। इसलिए ट्रैक के ब्रिज भूकंपरोधी बनाए गए हैं। NHSRCL के जनरल मैनेजर (कॉन्ट्रैक्ट) इंदुधर शास्त्री ने बताया कि पुल बेहद मजबूत बनाए जा रहे हैं, ताकि ट्रेन की स्पीड से समझौता न करना पड़े। इनकी उम्र 100 साल होगी।
14 ट्रैक्शन, 16 डिस्ट्रीब्यूशन सबस्टेशन बनाए जाएंगे
NHSRCL के मुताबिक, बुलेट ट्रेन की पावर सप्लाई के लिए 14 ट्रैक्शन और 16 डिस्ट्रीब्यूशन सबस्टेशन बनाए जाएंगे। ये सबस्टेशन बुलेट ट्रेन के स्टेशनों के पास ही होंगे। इन सबस्टेशनों के जरिए बिजली की जरूरत पूरी होगी। एक इलेक्ट्रिक सबस्टेशन सूरत के अंतरोली में बनाया गया है, वहां पावर सप्लाई के लिए गुजरात की ओर से 32 लोकेशनों पर कनेक्शन दे दिए गए हैं।
ट्रैक के दोनों तरफ लगेंगे नॉइज बैरियर
सोनिक स्पीड वाली ट्रेन के शोर से बाहर के लोग परेशान न हों, इसलिए वायाडक्ट के दोनों ओर नॉइज बैरियर लगाए जाएंगे। ये कॉन्क्रीट का एक मीटर चौड़ा पैनल होगा। इसकी ऊंचाई 2 मीटर रहेगी। शहरी और रिहायशी एरिया से गुजरने वाले ट्रैक में 3 मीटर ऊंचे नॉइज बैरियर लगाए जाएंगे। 2 मीटर कॉन्क्रीट पैनल के अलावा एक मीटर का ‘पॉलीकार्बोनेट’ नॉइज बैरियर होगा।
क्या आप जानते हैं 300 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली बुलेट ट्रेन का ट्रैक कैसे तैयार होता है। 40-40 मीटर लंबे 25 गर्डर मिलाकर एक किलोमीटर का ट्रैक बनता है। हर गर्डर का वजन 975 टन। इन्हें उठाने के लिए 216 पहियों का एक ट्रक लगता है। इस सीरीज के तीसरे पार्ट में पढ़िए कितना ट्रैक बना, कैसे बना और किन मशीनों का इस्तेमाल इसे बनाने के लिए किया जा रहा है…
अभी कहां पहुंची देश की पहली बुलेट ट्रेन…पार्ट-1:गुजरात में 40% काम पूरा, महाराष्ट्र में सिर्फ बोर्ड लगे
पहले बुलेट ट्रेन साल 2022 तक चलाए जाने का टारगेट था। फिर इसे बढ़ाकर 2023 किया गया और बीते मार्च में रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि अब 2026 तक इसके चालू होने की उम्मीद है। आखिर देश की पहली बुलेट कहां रह गई, ये जानने के लिए भास्कर की टीम ने अहमदाबाद से मुंबई तक का सफर किया। पढ़िए कहां पहुंची बुलेट ट्रेन..