मान्यवर:-अफगानिस्तान की धरती पर ‘आतंकी काफिरों की एक और फौज’ तैयार हो रही है। इस फौज के लड़ाके तालिबान को टक्कर देने के लिए तैयार किए जा रहे हैं। इनके पास वह सभी गोला-बारूद है जो तालिबानियों के पास हैं। इनके पास वह एडवांस्ड तकनीकी भी है जिससे तालिबानी पूरी दुनिया को टक्कर देने की दम भरते रहते हैं। दरअसल अफगानिस्तान में तालिबानियों को टक्कर देने के लिए उनके समानांतर नई फौज कोई और नहीं बल्कि चीन और पाकिस्तान अलग-अलग जिहादी संगठनों के साथ मिलकर तैयार कर रहे हैं।
जो मौका पड़ने पर तालिबान को भी पटकनी दे सकें और उन काफिरों के संगठन को जिंदा रखने वाले मुल्क के लिए अफगानिस्तान की जमीन तैयार कर सकें।अफगानिस्तान की जमीन पर चीन और पाकिस्तान द्वारा तैयार किए जाने वाले नए जिहादी आतंकी संगठनों की जानकारी दुनिया के उन सभी मुल्कों के पास है, जिनकी खुफिया एजेंसियां अफगानिस्तान जैसे मुल्क में दिन-रात काम करती रहती हैं। सीआईए, मोसाद और रॉ जैसी एजेंसियों को इस बारे में पूरी जानकारी है कि अफगानिस्तान के कौन से छोर पर इतनी उठापटक के बाद भी आतंकी संगठन को तैयार किया जा रहा है।
खुफिया विभाग से जुड़े रहे और अफगानिस्तान समेत ईरान और पाकिस्तान में रह कर काम कर चुके एक अधिकारी ने बताया कि अफगानिस्तान में हुए तख्तापलट से चीन और पाकिस्तान को झटका लगा है। हालांकि पाकिस्तान और चीन को इस बात का पूरा अंदाजा था कि तालिबान एक बार फिर से अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज होगा। यही वजह है अफगानिस्तान में तालिबान का विरोध करने वाले ताजिक गुटों को चीन ने हर तरीके की मदद के साथ खड़ा करना शुरू कर दिया। वह बताते हैं अफगानिस्तान की उत्तरी सीमा पर बसी ताजिक जनजाति का अफगान तालिबानियों से शुरुआत से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है।
ताजिक जनजाति को अफगान तालिबानियों के खिलाफ हर मोर्चे पर आगे करने के लिए सिर्फ चीन ही नहीं बल्कि रूस और अमेरिका भी समय-समय पर मदद करते रहे हैं। आज अफगानिस्तान में तालिबानियों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है।विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे में चीन की सबसे पहली कोशिश तो यही है कि वह तालिबानियों के साथ मिलकर कदम से कदम मिलाकर उनका सहयोग करें। इसके लिए चीन ने अपने प्रयास शुरू भी कर दिए हैं।
इन्हीं प्रयासों की कड़ी में जब दुनिया के तमाम मुल्क अफगानिस्तान से अपने दूतावासों को समेट कर वापस अपने मुल्क चले गए तो चीन और रूस ने अफगानिस्तान को एक तरीके से समर्थन देते हुए अपने दूतावासों को और अधिकारियों को काबुल से नहीं बुलाया। विदेशी मामलों के जानकार इसे एक रणनीतिक गेम के तौर पर देख रहे हैं।